तीन टांगों वाली खटिया

दादी तो दादी थी पर उनके खटिया की भी अलग कहानी थी, कहां गया एक पांव भला? क्षेत्रीय स्वाद से भरी हुई रचना

Sushma Tiwari
02 Jul, 2020 1 min read min read hi
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#Life questions #Village stories #Story
तीन टांगों वाली खटिया

Photo by Philippe Leone on Unsplash

वो दादी की खटिया थी। पिताजी के दादी की। तीन टांगों वाली। किसी ज़माने में उसके भी चार पाये थे और दादी को उसके सिवा कहीं नींद नहीं आती थी। दादी को सब ईश्वर के करीब मानते, शुद्ध आत्मा। तो आखिर दादी की खटिया के तीन पाये क्यों बचे थे?

गांव में सब दादी को बहुत मानते थे। किसी के घर जलुआ होता तो उनके खटिया से पाया निकाल कर ले जाते। जलुआ गांव में किसी लड़के की शादी में उसके बारात बिदा होने के बाद किया जाता है। सारी औरते इकट्ठा होकर रात भर नाच गाना करती हैं। इस समारोह में पुरुषों का प्रवेश निषिद्ध होता है। बाद में खटिया के पाये से बच्चे की आकृति बनाते है जिसपर गुंथा आटा लपेट कर नई दुल्हन के आने के बाद उसे देते हैं। कहते हैं यह शुभ प्रतीक होता है और दुल्हन की गोद जल्दी भर जाती है। दादी का आशीर्वाद सब बहुत शुभ मानते थे तो उखाड़ ले जाते उनके ही खटिये से। और सच सब का भला ही होता था। फिर एक दिन पड़ाईन चाची जो पाये ले गई फिर वापस ही नहीं किया उन्होंने।

" ए ईआ! हम ना देम, बताव शुभ के चीज़ केंते वापिस करीं? दोसर खटिया बनवा देम "

दादी मान गई। जाने दो उसका मन है तो। किसी का दिल दुखाना वो सोच भी नहीं सकतीं थी। कितनी मनुहार पर भी नया खाट नहीं बनवाया। ईंट पर ईंट जोड़ कर खटिया को एक सहारा दिया गया। उसके बाद बड़े बाउजी ने सब को साफ कह दिया अब कोई नहीं ले जाएगा एक भी पाया। सब बहुत निराश भी हुए थे पर बाउजी का आदेश गांव में कोई नहीं काटता था। 

दादी तो जैसे भविष्य देख सकती थीं वैसे बाते बताती, मौसम का हाल, खेती का अनुमान सब कुछ। उन दिनों दादी की तबीयत सही नहीं रहती थी। पर हम बच्चों को दादी के सिरहाने बैठ कुलदेवता की कहानियां सुनना बड़ा पसंद होता था। दादी अपनी कहानियां भी सुनाती थीं। दादी अपने पति की तीसरी पत्नी थी। इसलिए दादाजी को गुजरे ज़माना हो चुका था। दादी बताती थीं कि दादाजी की पहली दो पत्नियां बारी बारी उन्हें छोड़ गई। तब परिवार वालों के बहुत कसमें दिलाने पर वंश चलाने के लिए दादी से शादी की थी। दादी दादाजी से उम्र में छोटी होने के कारण दादाजी से बहुत डरती थीं। दादाजी भी उनसे नेह ना लगाते शायद उन्हें लगता था कि उनके किस्मत में स्त्री सुख नहीं है और एक दिन दादी भी उन्हें छोड़ जाएंगी। खैर दादाजी जाने से पहले तीन पुत्र और दो पुत्रियों से दादी की झोली भर कर गए। दादाजी के जाने के बाद भरी जवानी में दादी भगवान के शरण में आ गई थीं। कुलदेवता की तो विशेष कृपा थी उनपर।

उस साल नवमी पूजन से पहले ही दादी ने कह दिया था कि पूजन की तैयारी ना करे कोई। बड़ा आश्चर्य हुआ सब को, दादी और किसी त्यौहार की मनाही.. भला क्यों? दादी ने अपने पतोहू सब को पास बुलाया और कहा

" हमार जाए के समय आ गईल बा.. तैयारी मत करीह लोगिन, बेकार हो जाइ "

दरवाजे के ओट में मैं खड़ी यही सोच रही थी कि ऐसे कैसे दादी को पता है। वो तो बीमार भी नहीं है.. और हो भी तो क्या? हमे तो यही पढ़ाया जाता है कि मृत्यु छलिया है किसी को नहीं पता कब आएगी, फिर दादी से ऐसी क्या दोस्ती जो बता कर आ रही है। मेरे अविश्वास की छूत शायद उनकी पतोहू सब को भी लगी।

" हाँ हाँ अम्मा! हिल डूल नाही पाऊत हउ, बैठे बैठे इहे कुली सोचह "

हम बच्चे तो बोल आए दादी को की जब तुम जानती हो कब जाना है तो नवमी पूजन बाद जाना। हमारी खीर पूरी से क्या दुश्मनी भला तुम्हें? दादी हँस कर बोली थी कि मेरी मृत्यु भोज में तो मिलेगी खा लेना। जैसे जैसे पूजन का दिन करीब आ रहा था दादी और अधिक बीमार रहने लगी थीं। जाने कैसे? जैसे मन बना लिया हो इस क्षणभंगुर संसार से जाने का।

उस दिन सप्तमी थी हमारे यहां कुलदेवता का दिन मानते हैं उसे। उसी दिन दादी ने फिर अपने लड़कों को बुलावा भेजा। बेटियों को भी आजू बाजू वाले गांव से बुलवा लिया। उन्होंने बोला कि कल सुबह पांच बजे चली जाऊँगी। यहां पुआल बिछा दो, मैं नहीं चाहती कि खटिया अशुद्ध हो जाए। वैसे भी कहते है खाट पर प्राण निकले तो देवदूत नाराज होंगे। पुआल बिछा दिया गया। मैं जैसे वही खड़े होकर देखना चाहती थी दादी को जाते हुए। सबके कहने पर भी सिरहाने से टस से मस ना हुई। तय हुआ कि मौसम में थोड़ी ठण्ड है तो पुआल पर सुबह सुला देंगे अभी खाट पर रहने देते हैं। वैसे भी भली चंगी बाते कर रही थी ऐसे कैसे मर जाएंगी? सोचा तो था कि रात भर सोना नहीं है पर आंख लग गई। फिर हाथ पर हाथ के थपथपाहट से नींद खुली। बाहर पौ फ़ट आई थी। मैंने देखा मोटा सा लंबा सांप कमरे में घुस आया था। मेरे चीखने पर सब भाग कर आए। दादी को गोदान वगैरह पिछले दिन करा दिया गया था उनकी जिद पर। सब समझ गए सच जाने का वक्त आ गया है। क्योंकि साँप हमारे कुलदेवता का प्रतीक है और वही खुद लेने आए थे दादी को। दादी के इशारे पर उन्हें नीचे लिटाया जाने लगा पर हवा में ही उन्होंने प्राण त्याग दिए। घरवालो के रोहारोहट के बीच हम बच्चे दुबके पड़े थे। दादी दूसरे धाम को चलीं गई। अंतिम संस्कार धूम धाम से किया गया और सच अच्छे अच्छे व्यंजन बने। तब बड़ा बुरा लग रहा था। किसी की मृत्यु पर कैसी धूमधाम? उससे भी बुरा तब लगा जब उनके चीजों के साथ उनकी तीन पाये वाली खटिया को भी त्यागने का फैसला हुआ। आह! इससे अच्छा तो जीते जी पड़ाईन चाची जैसे लोगों को दे देते, सब को कितनी जरूरत थी दादी के आशीर्वाद की। इंसान जिवित रहता है तब तक जिवित रहती है उसकी शुभता उनके जाते ही फिर तो सब कपड़े बिस्तर अशुभ हो जाते हैं। हाँ पता नहीं क्यों सोने चांदी और हीरे जवाहरात मृत शरीर पर भी शुद्ध और शुभ ही रहते है। उसे पाने की होड़ रहती है।

आज मैं भी दादी हुं किसी की पर मेरी यादों से दादी और उनकी खटिया जैसे चिपकी हुई है। और हाँ मैं कब जाऊँगी इसका पता मुझे नहीं शायद दादी जैसे मैं कोई पुण्यात्मा नहीं हूं। 


©सुषमा तिवारी

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  • Kumar Sandeep · 6 years ago last edited 6 years ago

    निःशब्द हूं रचना पढ़ने के बाद

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