वो काग़ज की कश्ती

बचपन कहीं नहीं जाता, बस हम भूल जाते है। हम बड़े कभी नहीं होते बस हमे याद दिलाया जाता है कि तुम बड़े हो गए हो

Sushma Tiwari
15 Jul, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 2 💬 11 👁 1354
#Motivational #Never give up #Stories by Sushma #Paperboat #Monsoon
वो काग़ज की कश्ती

Photo by Ahmed Zayan on Unsplash

छपाक!!


और कीचड़ से सने पानी ने कुणाल के सफेद शर्ट पर कब्जा कर लिया। गुस्से से उसका मिजाज तमतमा गया। वह यकायक चार कदम पीछे हो लिया। 

कुणाल जो बस स्टॉप पर खड़ा था। उसे नहीं पता कि वह बस का इन्तेज़ार कर रहा था या ये उम्मीद की काश बस आए ही ना। तो क्या यह कीचड़ कोई इशारा है? फिर गुस्सा क्यों आया भला.. ओह ये तो सफेद शर्ट के लिए है जो माँ ने प्यार से जन्मदिन पर दी थी। शर्ट से ध्यान हटकर कीचड़ की तरफ और फिर नजर उन बच्चों की तरफ जो ये गुल खिला रहे थे। कुणाल ने देखा पास ही झुग्गी के बच्चे बस स्टॉप के पास सरकार द्वारा प्रदत्त गड्ढे में जमे बारिश के पानी में कूद रहे थे।


" बारिश आई छम - छम - छम

  छाता लेकर निकले हम

 फिसल गया पैर गिर गए हम

 नीचे छाता उपर हम "


बच्चे जो गा रहे थे फिर बारी बारी जानबूझ कर गिर रहे थे। कुणाल के चेहरे पर अब मुस्कान तैर गई और गुस्सा छू होता गया। उसे याद आया वह इतना गुस्सैल पहले नहीं था। ऐसा ही तो था वो हँसते, कूदते, कुलांचे मारते घूमता रहता था। माँ कहती थी कि इस लड़के के पांव में तो चकरी बंधे है, घूमता रहता है। कितना हसीन था वह समय, कॉलेज के दोस्तों के साथ आए दिन ट्रिप पर निकल जाना, फोटोग्राफी करना। माँ को पता था फोटोग्राफी में जान बसती थी उसकी। तभी तो जिद करके पापा से अठारहवें जन्मदिन पर प्रोफेशनल कैमरा दिलवाया था। पापा गुस्सा भी हुए थे कि यही पैसे पढ़ाई में खर्च होते तो उसका वसूल होता, शौक पर कौन खर्च करता है इतना? पर माँ तो माँ थी। पर अब माँ नहीं है। सब कुछ बदल गया है। पापा ने तो कुणाल को साफ साफ कह दिया कि पढ़ाई खत्म कर के कोई काम धाम देख लो। 

मध्यमवर्गीय परिवार अपने ख्वाबों का साइज भी मध्यम ही रखते है। बच्चे की पढ़ाई, बेटी की शादी और बुढ़ापे की बीमारी के लिए जतन करते करते भूल ही जाते है कि जिंदगी इसके अलावा भी है।

कुणाल ने समझौता कर लिया था। वैसे भी माँ नहीं रही और उनके साथ ही जैसे घर की सारी रौनक चली गई। बड़ी दीदी अब शांत रहती थी। ससुराल नजदीक था उनका तो आते जाते रहतीं थी। उन्होंने घर के लिए मेड रखवा दी थी। कुणाल ने कई बार सोचा इस शहर से दूर जाकर कुछ करे , अब मन नहीं लगता यहां फिर दिल कहता था कि कहीं पापा को भी कुछ हो गया तो उसका परिवार खत्म हो जाएगा। उसने तय किया कि क्यों ना पापा की खुशी के हिसाब से ही काम किया जाए। सच ही तो कहते है पापा पेट भरा हो तो बाकी चीजें भी अच्छी लगती है। पर हकीकत ये थी कि कुणाल ने पापा की सुनते - सुनते अपने दिल की सुनना तो कब का छोड़ दिया था। 

कुणाल ने सोचा था कि पढ़ाई खत्म कर के फोटोग्राफी का कोई एक्स्ट्रा कोर्स कर लेगा तो पापा ने हाथ जोड़ दिए थे।

" बेटा कोई नौकरी देख ले बाकी जो करना हो नौकरी के साथ साथ करना।" 

ये बात सिर्फ पापा बोलते तो चलती पर दिव्या भी? 

दिव्या कुणाल के बचपन की दोस्त थी और अब हमराज़ से हमराही बनने की राह में आगे बढ़ रही थी। बचपन से ही पढ़ने में होशियार दिव्या मास कम्युनिकेशन कि पढ़ाई कर एक न्यूज चैनल में रिपोर्टर के तौर पर काम कर रही थी। दिव्या ने भी कुणाल को यही कहा कि तुम कोई नौकरी देख लो ताकि मम्मी पापा से शादी की बात कर सकूं। उसने भी कई बार कोशिश की पर बिना प्रोफेशनल फोटोग्राफी के कोर्स के बिना वहाँ उसके साथ काम करना मुश्किल था। वैसे भी कुणाल को स्वच्छंद घूमना और फोटोग्राफी करना पसंद था ना कि गली गली माइक के पीछे घूमने का मन था। गलियां.. हाँ गलियों से याद आया कि कभी इन्हीं गलियों से उसे कितना प्यार था.. खासकर बारिश के मौसम में कागज की नाव चलाना। दीदी की नोटबुक फाड़ फाड़ कर नावें बनाता और गड्ढों में चलाता नालों में चलाता.. फिर पीछे पीछे भागता की वो कहाँ तक जाती है? डूबती हुई नावें उसे अच्छी नहीं लगती इसलिए हाथों हाथ दूसरी नाव तैयार रखता था। पर आज.. आज उसके पास जैसे कोई दूसरी नाव है ही नहीं। कुछ बड़ा करना चाहता था वह पर इस नौ से सात की नौकरी में फंस कर रह गया है।

रोज बस स्टॉप पर आता तो उसके साथ एक त्यागपत्र होता है। रोज सोचता कि आज सब कुछ छोड़ छाड़ दूँगा। फिर बॉस को देखता तो पापा याद आते और कुछ नहीं करता। 

आज इन बच्चों को खेलते देख उसे भी ख्याल आया कि कितनी छोटी छोटी खुशियो के सहारे बचपन कट जाता है फिर बड़े होने में ऐसा क्या है कि हर चीज़ मन मुताबिक ना हो तो इंसान इतना परेशान हो जाता है? क्यों उसे अब यह ख्याल नहीं आता कि डूबती नाव के बदले दूसरी नाव तैयार रखा जाए ना कि डूबने के डर से पानी में नाव उतारा ही ना जाए। ऐसा भी क्या बुरा था इस नौकरी में? उसे तो इतनी आजादी भी थी कि घर से काम करके प्रोजेक्ट सबमिट कर सकता है, और सच यह है कि रात भर जाग कर वो कर भी देता है फिर ऑफिस क्यों दौड़ा चला आता है। सिर्फ खुद को बिजी रखने के लिए? पर खुद को परेशान करने के अलावा कुछ नहीं मिला उसे अपनी इस हरकत से। 

परिस्थितियों को हँसी खुशी भी स्वीकार कर सकता था पर उसने क्या किया.. उलझा दी अपनी जिंदगी को। 

ख्यालों के भंवर से निकला तो देखा लोग बस स्टॉप के भीतर बढ़ने लगे थे शायद सबको बस आने की ख़बर मिल गई थी । बाहर बारिश तेज हो चली और बच्चे भी बस स्टॉप के अंदर आकर छुप गए थे। कुणाल मुस्कुराया और बैग से एक कागज निकाला और उसकी नाव बना कर उन बच्चों को दे दी। हाँ ये वही त्याग पत्र वाला काग़ज़ था जो उसके मन का बोझ बन कर बैठा था। आज उसकी भी रिहाई हो गई। उसने फोन निकाला और ऑफिस फोन लगाया 

" सर! मैं सोच रहा था वर्क फ्रॉम होम कर लूं.. वैसे भी आने जाने में फालतू समय जाता है " 

स्वीकृति पा कर एक फोन और लगाया 

" हैलो दिव्या! तुम्हारे कैमरा मैन को कोई अस्सिटेंट चाहिए हो तो बताना.. उसी बहाने तुम्हारे पास रहने का मौका मिल जाएगा " 

दिव्या की चीख बता रही थी कि वो हमेशा से चाहती थी उसका सान्निध्य। आज माँ होती तो कितनी खुश होती। खुश होगी जरूर.. क्योंकि माँ कहीं नहीं जाती है, वो हमेशा साथ होती है। 

" चलो मम्मा! पहले ये शर्ट धो लूँ और तुलसी वाली चाय पी लूँ वर्ना तुम नाराज हो जाओगी ना "

कहकर कुणाल घर की तरफ मुड़ गया। उसका घर जहां उसका परिवार है, उसकी खुशियां है। बारिश के साथ साथ बह गया मन पर पड़ा कीचड़ एक ही बार में। बच्चों की तरह कीचड़ में पैर छ्पछपाते हुए कुणाल फिर से बचपन वाला कुणाल था। 

©सुषमा तिवारी

2 likes
☕

Support Sushma Tiwari

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Sushma Tiwari
Published By

Sushma Tiwari

@SushmaTiwari

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Poonam Garg · 6 years ago last edited 6 years ago

    Bilkul Sahi baat. Isliye Mai khud me sada ek bachha zinda rakhti hu, beshak Uske liye Kisi k taane mile ya fir hansi... I don't care

  • Kumar Sandeep · 6 years ago last edited 6 years ago

    बहुत ही अच्छा लगा अंत तक कथा पढ़कर

  • Sonia Madaan · 6 years ago last edited 6 years ago

    Enjoyed reading ?

  • Avanti Srivastav · 6 years ago last edited 6 years ago

    Kya baat sarthak sandesh deti kahani

  • Sushma Tiwari · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thank you @poonam Garg

  • Sushma Tiwari · 6 years ago last edited 6 years ago

    @kumarsandeep thank you भाई

  • Sushma Tiwari · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thanks Sonia

  • Sushma Tiwari · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thanks Avanti

  • Charu Chauhan · 6 years ago last edited 6 years ago

    Superb ?

  • Dr Jyoti agrawal · 6 years ago last edited 6 years ago

    Acchi। h kahani

  • Ankita Bhargava · 6 years ago last edited 6 years ago

    भावप्रवण कहानी

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read min

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

562 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 11 Jun, 2025 • 1 min read min

माफ़ी का मर्म

यह कहानी एक बुजुर्ग मुस्लिम इमाम हाजी यूसुफ़ साहब की है, जिनके बेटे की नृशंस हत्या पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने कर दी। हत्या का कोई मजहबी या व्यक्तिगत कारण नहीं था — बस घृणा और ग़लतफहमी से उपजा हिंसक आवेग। पूरे मोहल्ले में शोक और ग़ुस्से का माहौल था। लेकिन जब अदालत में हाजी यूसुफ़ से यह पूछा गया कि वे क्या सज़ा चाहते हैं, तो उन्होंने हत्यारे को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बदला लूंगा, तो मैं भी उसी घृणा में जीऊंगा जिसने मेरे बेटे की जान ली। लेकिन अगर मैं माफ कर दूं, तो शायद यह घृणा का अंत हो।" यह निर्णय सबको चौंका देता है — पड़ोसी, गैर-मुस्लिम मित्र, और समाज के वे लोग भी जो सोचते थे कि धर्म अलग करता है। इस माफ़ी ने लोगों को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर कर दिया: जब ग़लती उसकी नहीं थी, तो वह फिर भी माफ कैसे कर सका? क्या हम दूसरों की गलतियों को इस तरह क्षमा कर सकते हैं? क्या हमारा धर्म, जाति, या पूर्वग्रह हमें मानवता से दूर कर रहे हैं? "माफ़ी का मर्म" सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली इंसानियत की पुकार है — यह दिखाती है कि सच्ची शक्ति बंदूक में नहीं, माफ़ी में होती है।

559 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 06 Jun, 2025 • 1 min read min

माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी"

"माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी" यह कहानी एक जुझारू माँ सलमा बी की है, जो अपने निर्दोष बेटे रामिज को झूठे चोरी के आरोप से बचाने के लिए अकेले लड़ती है। बिना पैसे, बिना सहारे, लेकिन सच्चाई और ममता के बल पर वह गवाह ढूंढती है, सबूत इकट्ठा करती है और अंततः अपने बेटे को जेल से आज़ाद कराती है। यह कहानी हर माँ के हौसले और हर बेगुनाह की उम्मीद का प्रतीक है।

462 0
More stories in Fiction
Frances Jean Albino • 18 Jul, 2024 • 1 min read min

Someone once hurt me, but I choose to forgive

Choosing to forgive

1001 0